Copy Paste – 22 प्राकृतिक घड़ी और मानव शरीर

प्राकृतिक घड़ी पर आधारित शरीर की दिनचर्या ==============================

प्रातः 3 से 5 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से फेफड़ो में होती है। थोड़ा गुनगुना पानी पीकर खुली हवा में घूमना एवं प्राणायाम करना । इस समय दीर्घ श्वसन करने से फेफड़ों की कार्यक्षमता खूब विकसित होती है। उन्हें शुद्ध वायु (आक्सीजन) और ऋण आयन विपुल मात्रा में मिलने से शरीर स्वस्थ व स्फूर्तिमान होता है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाले लोग बुद्धिमान व उत्साही होते है, और सोते रहनेवालो का जीवन निस्तेज हो जाता है ।

प्रातः 5 से 7 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से आंत में होती है। प्रातः जागरण से लेकर सुबह 7 बजे के बीच मल-त्याग एवं स्नान कर लेना चाहिए । सुबह 7 के बाद जो मल – त्याग करते है उनकी आँतें मल में से त्याज्य द्रवांश का शोषण कर मल को सुखा देती हैं। इससे कब्ज तथा कई अन्य रोग उत्पन्न होते हैं।

प्रातः 7 से 10 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से आमाशय में होती है। यह समय भोजन के लिए उपयुक्त है । इस समय पाचक रस अधिक बनते हैं।

प्रातः 10 से 1 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से हृदय में होती है। दोपहर 12 बजे के आस–पास मध्याह्न – संध्या (आराम ) करने की हमारी संस्कृति में विधान है। इसीलिए भोजन वर्जित है। इस समय तरल पदार्थ ले सकते है। जैसे मट्ठा पी सकते है। दही खा सकते है ।

दोपहर 1 से 3 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से छोटी आंत में होती है। इसका कार्य आहार से मिले पोषक तत्त्वों का अवशोषण व व्यर्थ पदार्थों को बड़ी आँत की ओर धकेलना है। भोजन के बाद प्यास अनुरूप पानी पीना चाहिए । इस समय भोजन करने अथवा सोने से पोषक आहार-रस के शोषण में अवरोध उत्पन्न होता है व शरीर रोगी तथा दुर्बल हो जाता है ।

दोपहर 3 से 5 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से मूत्राशय में होती है । 2-4 घंटे पहले पिये पानी से इस समय मूत्र-त्याग की प्रवृति होती है।

शाम 5 से 7 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से गुर्दे में होती है। इस समय हल्का भोजन कर लेना चाहिए। शाम को सूर्यास्त से 40 मिनट पहले भोजन कर लेना उत्तम रहेगा। सूर्यास्त के 10 मिनट पहले से 10 मिनट बाद तक (संध्याकाल) भोजन न करे। शाम को भोजन के तीन घंटे बाद दूध पी सकते है । देर रात को किया गया भोजन सुस्ती लाता है यह अनुभवगम्य है।

रात्री 7 से 9 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से मस्तिष्क में होती है । इस समय मस्तिष्क विशेष रूप से सक्रिय रहता है । अतः प्रातःकाल के अलावा इस काल में पढ़ा हुआ पाठ जल्दी याद रह जाता है । आधुनिक अन्वेषण से भी इसकी पुष्टी हुई है।

रात्री 9 से 11 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से रीढ़ की हड्डी में स्थित मेरुरज्जु में होती है। इस समय पीठ के बल या बायीं करवट लेकर विश्राम करने से मेरूरज्जु को प्राप्त शक्ति को ग्रहण करने में मदद मिलती है। इस समय की नींद सर्वाधिक विश्रांति प्रदान करती है । इस समय का जागरण शरीर व बुद्धि को थका देता है । यदि इस समय भोजन किया जाय तो वह सुबह तक जठर में पड़ा रहता है, पचता नहीं और उसके सड़ने से हानिकारक द्रव्य पैदा होते हैं जो अम्ल (एसिड) के साथ आँतों में जाने से रोग उत्पन्न करते हैं। इसलिए इस समय भोजन करना खतरनाक है।

रात्री 11 से 1 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से पित्ताशय में होती है । इस समय का जागरण पित्त-विकार, अनिद्रा , नेत्ररोग उत्पन्न करता है व बुढ़ापा जल्दी लाता है । इस समय नई कोशिकाएं बनती है ।

रात्री 1 से 3 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से लीवर में होती है । अन्न का सूक्ष्म पाचन करना यह यकृत का कार्य है। इस समय का जागरण यकृत (लीवर) व पाचन-तंत्र को बिगाड़ देता है । इस समय यदि जागते रहे तो शरीर नींद के वशीभूत होने लगता है, दृष्टि मंद होती है और शरीर की प्रतिक्रियाएं मंद होती हैं। अतः इस समय सड़क दुर्घटनाएँ अधिक होती हैं।

नोट :– ऋषियों व आयुर्वेदाचार्यों ने बिना भूख लगे भोजन करना वर्जित बताया है। अतः प्रातः एवं शाम के भोजन की मात्रा ऐसी रखे, जिससे ऊपर बताए भोजन के समय में खुलकर भूख लगे। जमीन पर कुछ बिछाकर सुखासन में बैठकर ही भोजन करें। इस आसन में मूलाधार चक्र सक्रिय होने से जठराग्नि प्रदीप्त रहती है। कुर्सी पर बैठकर भोजन करने में पाचनशक्ति कमजोर तथा खड़े होकर भोजन करने से तो बिल्कुल नहींवत् हो जाती है। इसलिए ʹबुफे डिनर से बचना चाहिए। पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का लाभ लेने हेतु सिर पूर्व या दक्षिण दिशा में करके ही सोयें, अन्यथा अनिद्रा जैसी तकलीफें होती हैं। शरीर की जैविक घड़ी को ठीक ढंग से चलाने हेतु रात्रि को बत्ती बंद करके सोयें। इस संदर्भ में हुए शोध चौंकाने वाले हैं। देर रात तक कार्य या अध्ययन करने से और बत्ती चालू रख के सोने से जैविक घड़ी निष्क्रिय होकर भयंकर स्वास्थ्य-संबंधी हानियाँ होती हैं।

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Copy Paste – 21 पानी को साफ करने के प्राकृतिक तरीके ।

पानी को साफ करने के प्राकृतिक तरीके 


पानी सारे प्राणियों के जीवन का आधार है। आप भोजन के बिना एक माह से अधिक जीवित रह सकते हो, परन्तु जल के बिना आप एक सप्ताह से अधिक जीवित नहीं रह सकते । पानी ही जीवन है, लेकिन जितना जरुरी हमारे लिए ये पानी है उतना ही जरूरी इसका साफ और स्वच्छ होना भी है।

आज पानी को साफ़ करने का बहुत ज़ोर शोर से प्रचार किया जा रहा हैं। फ़िल्टर जो पानी को साफ़ करने की लिए इस्तमाल हो रहें है उनमे से ज्यादातर फिल्टर्स दूषित किटाणुओ के साथ-साथ जरूरी मिनरल्स को भी ख़त्म कर देते है। पानी को साफ़ करने के नाम पर हम पानी से मिलने वाले मिनरल्स और ज़रूरी तत्वों को नष्ट कर देते हैं, और अपने शरीर को जिसमे 75 % पानी हैं उसके रोग प्रतिरोध प्रणाली को ध्वस्त कर रहे हैं।
आज हम आपको बताने जा रहें है तुलसी का एक ऐसा प्रयोग जो दूषित कीटाणुओं के प्रभाव को ख़त्म कर पानी की गुणवत्ता और शक्ति को और भी बढ़ाएगा ।
तुलसी – प्राकृतिक वाटर प्यूरीफायर ।



तुलसी की पत्तियां में खाद्य वस्तुओं को विकृत होने से बचाने का अदभुत गुण है। सूर्यग्रहण आदि के समय जब खाने का निषेध रहता है तब खाद्य वस्तुओं में तुलसी की पत्तियां डालकर यह मान लिया जाता है की वस्तुएं विकृत नही हुई है। मृत व्यक्ति के पास भी तुलसी का पौधा रखने की परम्परा के पीछे भी यही रहस्य जान पड़ता है। जहां पर तुलसी का पौधा होता है उसके आस-पास छ: सो फुट की वायु इससे प्रभावित होती है और परिणामस्वरूप मलेरिया, प्लेग और क्षय के कीटाणु नष्ट हो जाते है। विभिन्न रोगों के कीटाणुओं का नाश करने में समर्थ तुलसी में जहां शरीर के भीतर रक्त आदि को शुद्ध करने और विभिन्न प्रकार के विषों को दूर करने की आश्चर्यजनक शक्ति है, वहां तुलसी की गंध में अपनी चारों दिशाओं की वायु को शुद्ध और स्वास्थ्यप्रद बनाने की अदभुत क्षमता है। वास्तव में यह एक दिव्य गुणमयी, चमत्कापूर्ण अमृत-बूटी है।

..विधि..

दूषित जल में तुलसी की हरी स्वच्छ पत्तियां (चार लीटर जल में 25-30 पत्तियां) डालने से थोड़ी देर में जल शुद्ध और पवित्र हो जाता है। ये प्रयोग आप साफ़ पानी में भी कीजिये। इस से पानी में अनोखी शक्ति भर जाती हैं और ये हमको साधारण ही नहीं बल्कि कैंसर तक के रोगो से लड़ने में मदद करता हैं।

..विशेष..

जहाँ पर पानी खारा हो वो लोग अगर फ़िल्टर लगवाते हैं तो उनको सीधे फ़िल्टर का पानी नहीं पीना चाहिए। पानी को फ़िल्टर कर के पहले मिटटी के घड़े या ताम्बे के बर्तन में रखे उसके बाद ही उसको इस्तेमाल करे।

..विकल्प..

जहाँ पर पानी को साफ़ करने का कोई साधन ना हो वहां पर पानी को उबाल कर पीना चाहिए और अगर आपके घर पर सीधा नहर का पानी आता हैं तो आपको किसी भी फ़िल्टर की ज़रूरत नहीं हैं। किसी बर्तन में कोयले को पीस कर रख लीजिये, अब इसमें पानी डालिये। कुछ देर में पानी अपने आप साफ़ हो जायेगा। अब इस साफ़ पानी को छान कर रख लीजिये। बड़े बड़े वाटर वर्क्स में इसी प्रकार से पानी को साफ़ करने की विधि अपनायी जाती हैं।

अगर फिर भी पानी की वजह से कोई समस्या जैसे दूषित जल सेवन से बच्चों के पेट में कृमि हो जाए तो अजवायन चार भाग काला नमक एक भाग का चूर्ण बनाकर आधा ग्राम से डेढ़ ग्राम तक अवस्थानुसार गर्म जल के साथ सेवन करना चाहिए।

धन्यवाद ।

Copy Paste – 20 ​मकर संक्रांति का पौराणिक तथ्य ।

​मकर संक्रांति : पौराणिक तथ्य
हमारे पवित्र पुराणों के अनुसार …

मकर संक्रांति का पर्व ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश, आद्यशक्ति और सूर्य की आराधना एवं उपासना का पावन व्रत है, जो तन-मन-आत्मा को शक्ति प्रदान करता है। 

संत-महर्षियों के अनुसार इसके प्रभाव से प्राणी की आत्मा शुद्ध होती है। संकल्प शक्ति बढ़ती है। ज्ञान तंतु विकसित होते हैं। मकर संक्रांति इसी चेतना को विकसित करने वाला पर्व है। यह संपूर्ण भारत वर्ष में किसी न किसी रूप में आयोजित होता है।

*पुराणों के अनुसार मकर संक्रांति के दिन सूर्य अपने पुत्र शनि के घर एक महीने के लिए जाते हैं, क्योंकि मकर राशि का स्वामी शनि है। हालांकि ज्योतिषीय दृष्टि से सूर्य और शनि का तालमेल संभव नहीं, लेकिन इस दिन सूर्य खुद अपने पुत्र के घर जाते हैं। इसलिए पुराणों में यह दिन पिता-पुत्र के संबंधों में निकटता की शुरुआत के रूप में देखा जाता है।

*  इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत करके युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी। उन्होंने सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था। इसलिए यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता को खत्म करने का दिन भी माना जाता है।

*  एक अन्य पुराण के अनुसार गंगा को धरती पर लाने वाले महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था। उनका तर्पण स्वीकार करने के बाद इस दिन गंगा समुद्र में जाकर मिल गई थी। इसलिए मकर संक्रांति पर गंगा सागर में मेला लगता है।

* विष्णु धर्मसूत्र में कहा गया है कि पितरों की आत्मा की शांति के लिए एवं स्व स्वास्थ्यवर्द्धन तथा सर्वकल्याण के लिए तिल के छः प्रयोग पुण्यदायक एवं फलदायक होते हैं- तिल जल से स्नान करना, तिल दान करना, तिल से बना भोजन, जल में तिल अर्पण, तिल से आहुति, तिल का उबटन लगाना।

* सूर्य के उत्तरायण होने के बाद से देवों की ब्रह्म मुहूर्त उपासना का पुण्यकाल प्रारंभ हो जाता है। इस काल को ही परा-अपरा विद्या की प्राप्ति का काल कहा जाता है। इसे साधना का सिद्धिकाल भी कहा गया है। इस काल में देव प्रतिष्ठा, गृह निर्माण, यज्ञ कर्म आदि पुनीत कर्म किए जाते हैं। मकर संक्रांति के एक दिन पूर्व से ही व्रत उपवास में रहकर योग्य को दान देना चाहिए।

* रामायण काल से भारतीय संस्कृति में दैनिक सूर्य पूजा का प्रचलन चला आ रहा है। राम कथा में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम द्वारा नित्य सूर्य पूजा का उल्लेख मिलता है। रामचरित मानस में ही भगवान श्री राम द्वारा पतंग उड़ाए जाने का भी उल्लेख मिलता है। मकर संक्रांति का जिक्र वाल्मिकी रचित रामायण में मिलता है। 

* राजा भगीरथ सूर्यवंशी थे, जिन्होंने भगीरथ तप साधना के परिणामस्वरूप पापनाशिनी गंगा को पृथ्वी पर लाकर अपने पूर्वजों को मोक्ष प्रदान करवाया था। राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों का गंगाजल, अक्षत, तिल से श्राद्ध तर्पण किया था। तब से माघ मकर संक्रांति स्नान और मकर संक्रांति श्राद्ध तर्पण की प्रथा आज तक प्रचलित है। 

* कपिल मुनि के आश्रम पर जिस दिन मां गंगे का पदार्पण हुआ था, वह मकर संक्रांति का दिन था। पावन गंगा जल के स्पर्श मात्र से राजा भगीरथ के पूर्वजों को स्वर्ग की प्राप्ति हुई थी। कपिल मुनि ने वरदान देते हुए कहा था, ‘मातु गंगे त्रिकाल तक जन-जन का पापहरण करेंगी और भक्तजनों की सात पीढ़ियों को मुक्ति एवं मोक्ष प्रदान करेंगी। गंगा जल का स्पर्श, पान, स्नान और दर्शन सभी पुण्यदायक फल प्रदान करेगा।’ 

* महाभारत में पितामह भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने पर ही स्वेच्छा से शरीर का परित्याग किया था। उनका श्राद्ध संस्कार भी सूर्य की उत्तरायण गति में हुआ था। फलतः आज तक पितरों की प्रसन्नता के लिए तिल अर्घ्य एवं जल तर्पण की प्रथा मकर संक्रांति के अवसर पर प्रचलित है।

* सूर्य की सातवीं किरण भारत वर्ष में आध्यात्मिक उन्नति की प्रेरणा देने वाली है। सातवीं किरण का प्रभाव भारत वर्ष में गंगा-जमुना के मध्य अधिक समय तक रहता है। इस भौगोलिक स्थिति के कारण ही हरिद्वार और प्रयाग में माघ मेला अर्थात मकर संक्रांति या पूर्ण कुंभ तथा अर्द्धकुंभ के विशेष उत्सव का आयोजन होता है।
जैसे कि पितृ तुल्य भगवान भास्कर दक्षिणायन से उत्तरायण में जा रहे हैं

ऊर्जामयी रश्मियाँ अपना प्रवास बढ़ाने वाली हैं 

अतुल्य शक्ति स्त्रोत प्रकृति अंधेरी रातें छोटी कर

दिन का उजाला बढ़ाने वाली है

धरती माता उदरस्त अनाज को पकाने वाली है 

मल्टी विटामिन से भरपूर “तिल” “गुड़” के साथ मिलकर रक्त का भी शोधन करने वाला है

जब सब कुछ ही अच्छा होने वाला है

तो क्यों न मनोभावों की निराशा का संक्रमण कर सकारात्मकता और व्यवहार में नवीन ऊर्जा का संचार कर जीवन में मंगल बढ़ाया जाए और सही अर्थों में संक्रांति उत्सव मनाया जाए…

सबको मकर संक्रान्ति की हार्दिक शुभकामनायें !

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